धन्य धन्य वृषभानु दुलारी - श्री सूरदास, सूरसागर, राधा कृष्ण (94)

धन्य धन्य वृषभानु दुलारी - श्री सूरदास, सूरसागर, राधा कृष्ण (94)

(राग बिलावल)
धन्य धन्य वृषभानु दुलारी ।
धनि माता धनि पिता धन्य वृज धनि तेरी उपजाई प्यारी ॥1॥
धन्य दिबस धनि निसा तबहिकी धन्य घड़ी धन जाय ।
धन्य कान्ह तेरौ बड़भागी, धनि बस कीन्है श्याम ॥2॥
धनि मति धनि गति धनि तेरौ हित धन्य भक्ति धनि भाव ।
'सूरश्याम' पति धन्य नारि तू, धनि-धनि एक स्वभाव ॥3॥

- श्री सूरदास, सूरसागर, राधा कृष्ण (94)

श्री वृषभानु जी की बेटी (श्री राधा) धन्य हैं। उनके माता-पिता भी धन्य हैं, और यह बृज भी धन्य हैं जहाँ प्यारी किशोरी जी का निवास है। [1]
वह दिन धन्य है, वह रात्रि धन्य है, एवं वह घड़ी (समय) धन्य है । आपके (किशोरी जी के) प्यारे श्री कृष्ण बड़े भाग्यवान हैं जिनमें आपने (किशोरी जी ने) मोह रखा है अर्थात वश में किया हुआ है। [2]
वह मति (बुद्धि) धन्य हैं, वह गति धन्य हैं, वह जीव धन्य हैं जिस पर आपने कृपा बरसायी हुई है। वह धन्य हैं जिसे आपकी कृपा से प्रेम-भक्ति मिलती हैं। श्री सूरदास जी कहते हैं, श्री कृष्ण केवल आपके प्रियतम होने से धन्य हुए हैं। श्री सूर दास जी कहते हैं कि आप दोनों का यह स्वभाव धन्य हैं अर्थात आपका एक दूसरे के प्रति नित्य प्रेम में डूबे रहने का स्वभाव ही धन्य है। [3]

[ऐसा माना जाता है कि सूर दास के पदों में जहां ‘सूर श्याम’आता है वह पद साक्षात श्याम सुंदर ने लिखे हैं श्री सूरदास जी के संकल्प [पदों] को पूरा करने के लिए]