हम डरहूँ डर ते ना डरेँ - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धान्त माधुरी (131)

हम डरहूँ डर ते ना डरेँ - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धान्त माधुरी (131)

हम डरहूँ डर ते ना डरेँ। [1]
कोउ कर निंदन कोउ अभिनंदन, जेहि जो भावे सो करें। [2]
रहें सदा अलमस्त रैन दिन, जिन हो जरना सो जरें। [3]
गावें नाम रूप गुन लीला, करम - कीच बिच क्यों परें। [4]
ध्यावें मोहन रूप माधुरी, सुत वित नारिन क्यों मरें। [5]
पियें ‘कृपालु’ सदा प्रेमामृत, पंच प्रपंचनि हरि हरें।। [6]

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धान्त माधुरी (131)

भावार्थ:- हम साक्षात् भय के भय से भी भयभीत नहीं होते। [1]
कोई निन्दा करे चाहे अभिनन्दन करे जिसको जो रुचे, करे। [2]
हम तो सदा श्याम रंग में मस्त रहते हैं, जिसको हम से ईर्ष्या करना हो किया करे। [3]
हम सदा श्यामसुन्दर के नाम, रूप, लीला, गुणादिकों को गाते रहते हैं अन्य कर्मों की कीचड़ में क्यों पड़ें। [4]
हम श्यामसुन्दर की रूप माधुरी का सदा ध्यान करते रहते हैं, पुत्र, धन, स्त्री में क्यों मरें। [5]
‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हम सदा प्रेम सुधा पीते रहते हैं, पंच ज्ञानेन्द्रियों के प्रपंचों को श्यामसुन्दर अपने आप हर लेते हैं। [6]