मिलि है कब अंगधार ह्वै, श्री बन बीथिन धूर।
परिहैं पद पंकज जुगल, मेरी जीवन मूर॥
- ब्रज के दोहे
वह धन्य घड़ी कब आएगी, जब मैं श्री वृन्दावन की गलियों की परम पावन रज (धूल) बन जाऊँगा, तब मेरे जीवन के आधार, मेरे प्राण-सर्वस्व युगल किशोर के श्री चरण-कमल मेरे ऊपर पड़ेंगे? उस रज में एक होना ही इस जीवन की सार्थकता है।
परिहैं पद पंकज जुगल, मेरी जीवन मूर॥
- ब्रज के दोहे
वह धन्य घड़ी कब आएगी, जब मैं श्री वृन्दावन की गलियों की परम पावन रज (धूल) बन जाऊँगा, तब मेरे जीवन के आधार, मेरे प्राण-सर्वस्व युगल किशोर के श्री चरण-कमल मेरे ऊपर पड़ेंगे? उस रज में एक होना ही इस जीवन की सार्थकता है।

