जो कछु कहत लाड़िलौ लाड़िली  - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (45)

जो कछु कहत लाड़िलौ लाड़िली - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (45)

(राग केदारौ)
जो कछु कहत लाड़िलौ लाड़िली जू सुनियै कान दै। [1]
जो जिय उपजै सो तिहारेई हित की कहत हौं आन दे ॥ [2]
मोहिं न पत्याहु तौ छाती टकटोरि देखौ पान दै। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी जाचक कौं दान दै ॥ [4]

-ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (45)

सखी के समझाने पर कि प्रिय के उर में और कोई नहीं विलस रही यह आप ही हैं। परन्तु लाड़िली मानी नहीं। तब लाल जी के कहने पर सखी कहने लगी- प्यारे जो कुछ भी कह रहा है उन्हें कान देकर सुनिए। [1]
पिय के हृदय में केवल आप ही बसती है। आप सावधान हो देखिए - आप के बिना और कोई नहीं प्यारी। प्रिय के उर में जो कुछ उदय होता है वह सब आप के हित में हैं। [2]
प्रिय आप की सौगन्ध खा कह रहे हैं- अगर आपको मेरे कथनों पर विश्वास नहीं तो मेरे हृदय वक्ष स्थल को स्पर्श कर टटोल कर देखें, किस सुन्दरी ने मुझे मोह लिया है, आप स्वत: ही स्वयं के प्रतिबिंब से मोहा गई है। [3]
हरिदासी सखी अपनी स्वामिनी से कह रही हैं - कुंजबिहारी आपके तनरूप कुंज में ‘नित्य विहार’ करते हैं। वे याचक बने आपसे रति रस केलिसुख एवं अधर पान का दान माँग रहे हैं। आप नित्य दानी कृपालु तथा वे नित्य याचिका हैं। [4]