हमारी रसिक सिरोमनि प्यारी ।
लीयै सुभाव रहत निसिवासर तन मन अति हितकारी ॥ [1]
जोई जोई रुचै करै पुनि सोई जीवनि प्रान अधारी ।
श्रीहरिदासी ललित किसोरी छिनं हूँ होति न न्यारी ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (66)
प्रस्तुत पद मेन श्री राधारानी के विलाक्षण स्वभाव का वर्णन किया है । श्री ललित किशोरी कहते हैं की हमारी रसिकों की शिरोमणी प्यारी तन मन से अति ही हितकारी हैं जिनका स्वभाव ही नित्य कृपा बरसाना है । [1]
वह नित्य वही रस बरसाती हैं जो हमें रुचिकर है, हमारे प्राणों का आधार भी वही हैं। श्री हरिदास दुलारी श्री राधा एक क्षण को भी हमसे विलग नहीं होती । [2]
लीयै सुभाव रहत निसिवासर तन मन अति हितकारी ॥ [1]
जोई जोई रुचै करै पुनि सोई जीवनि प्रान अधारी ।
श्रीहरिदासी ललित किसोरी छिनं हूँ होति न न्यारी ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (66)
प्रस्तुत पद मेन श्री राधारानी के विलाक्षण स्वभाव का वर्णन किया है । श्री ललित किशोरी कहते हैं की हमारी रसिकों की शिरोमणी प्यारी तन मन से अति ही हितकारी हैं जिनका स्वभाव ही नित्य कृपा बरसाना है । [1]
वह नित्य वही रस बरसाती हैं जो हमें रुचिकर है, हमारे प्राणों का आधार भी वही हैं। श्री हरिदास दुलारी श्री राधा एक क्षण को भी हमसे विलग नहीं होती । [2]

