सुधाकरमुधाकरं प्रतिपदस्फुरन्माधुरी, धुरोण नव चन्द्रिका जलधि तुन्दिलं राधिके ।
अतृप्त हरि-लोचन-द्वय चकोर-पेयं कदा, रसाम्बुधि समुन्नतं वदन-चन्द्रमीक्षे तव ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (161)
जो सुधाकर (चन्द्र) को भी असत् कर दिखाने वाला है, जो पद-पद पर देदीप्यमान् माधुरी के श्रेष्ठतम् सार-रूप नवीन किरणों के समुद्र से पूरित है, जो श्रीहरि अतृप्त के युगल-लोचन-चकोरों का पेय है और जो रस-समुद्र द्वारा प्रकर्ष को प्राप्त है। हे श्रीराधे ! मैं आपके उस वदन-चन्द्र को कब देखूँगी ?
अतृप्त हरि-लोचन-द्वय चकोर-पेयं कदा, रसाम्बुधि समुन्नतं वदन-चन्द्रमीक्षे तव ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (161)
जो सुधाकर (चन्द्र) को भी असत् कर दिखाने वाला है, जो पद-पद पर देदीप्यमान् माधुरी के श्रेष्ठतम् सार-रूप नवीन किरणों के समुद्र से पूरित है, जो श्रीहरि अतृप्त के युगल-लोचन-चकोरों का पेय है और जो रस-समुद्र द्वारा प्रकर्ष को प्राप्त है। हे श्रीराधे ! मैं आपके उस वदन-चन्द्र को कब देखूँगी ?

