तीन लोक ते सरस है, वृंदावन सुख कंद।
जहँ निस दिन विहरत रहैं, श्री राधागोविंद॥
- श्री लाल बलबीर जी, वृन्दावन शतक (8)
श्रीवृन्दावन धाम तीनों लोकों से भी अधिक सरस है, क्योंकि वृन्दावन का दिव्य रस तीनों लोकों में कहीं नहीं मिलता; वहीं श्री राधा-कृष्ण नित्य विहार करते हैं।
जहँ निस दिन विहरत रहैं, श्री राधागोविंद॥
- श्री लाल बलबीर जी, वृन्दावन शतक (8)
श्रीवृन्दावन धाम तीनों लोकों से भी अधिक सरस है, क्योंकि वृन्दावन का दिव्य रस तीनों लोकों में कहीं नहीं मिलता; वहीं श्री राधा-कृष्ण नित्य विहार करते हैं।

