सुहागिनि राधा रानी  -  श्री आनन्दघन जी, पदावली  (65)

सुहागिनि राधा रानी - श्री आनन्दघन जी, पदावली (65)

(राग बिहाग)
सुहागिनि राधा रानी। [1]
स्यामसुंदर ब्रजराज-दुलारो जाकें बस अभिमानी। [2]
सोभा को सिर छत्र बिराजै बृंदाबन रजधानी। [3]
जीति लियौ कियौ रूप-पपीहा आनँदघन रसदानी॥ [4]

-  श्री आनन्दघन जी, पदावली  (65)

श्री श्याम सुंदर, ब्रजराज-दुलारे जिनके नित्य ही वश में रहकर स्वयं को अभिमानी मानते हैं वही परम सुहागिनी श्री राधा रानी हैं। [1 & 2]
श्री किशोरी जी के सिर पर छत्र विराज रहा है एवं जिनकी रजधानी श्री वृंदावन धाम है । [3]
श्री आनँदघन कह रहे हैं "रस प्रदायिनी श्री राधा रानी ने श्री श्यामसुंदर को अपने रस वश कर उनको जीत लिया है, वह सदैव ही श्री राधा रानी की रूप माधुरी में डूबे हुए हैं, वही श्री राधारानी आनंद घन की भी स्वामिनी हैं"। [4]