राधिका आज आनन्द में डोलें - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (67)

राधिका आज आनन्द में डोलें - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (67)

(दोहा)
साँवर ससि सँग लसि प्रिया, भरी सरस रस छंद।
डोलत हैं श्रीराधिका, अति ही आजु आनंद॥


(पद) [राग केदारौ, ताल - यात्रा]
राधिका आज आनन्द में डोलें॥
साँवरे चंद गोविन्द के रस भरी दूसरी कोकिला मधुर स्वर बोलें॥ [1]
पहर तन नील पट कनक हारावली हाथ लें आरसी रूप को तोलें॥
कहत श्रीभट्ट व्रजनारिन नागर बनी कृष्ण के शील की ग्रन्थिका खोलें॥ [2]

- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (67)

(दोहा)
जिस प्रकार पूर्ण चन्द्रमा के साथ उसकी शीतल चाँदनी (ज्योत्स्ना) शोभा पाती है, उसी प्रकार श्रीश्यामसुन्दर के साथ रसमय स्वरूप वाली श्रीराधिका परम सुशोभित हो रही हैं। आज वे अगाध आनन्द में निमग्न होकर डोल कर रही हैं।

(पद)
सांवरे चंद्र श्री गोविन्द के रस में मग्न श्री राधिका जू आज आनंद में विहरण कर रही हैं और संग में कोयल भी मधुर स्वर से बोल रहे हैं। [1]

श्री राधिका जू ने नील वर्ण की साड़ी धारण की है और उनके केशों में स्वर्ण निर्मित हारावली बंधी है। अपने हाथ में आरसी लिए श्री राधिका जू श्री कृष्ण के रूप से मिलान कर रही हैं। श्री भट्ट देवाचार्य कह रहे हैं "श्री श्यामसुंदर आज ब्रज की सखी बनकर श्री राधिका जू की सेवा में अपने विनयशीलता का प्रदर्शन कर रहे हैं।" [2]