वृन्दावन तरु-तरु तरे - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (96)

वृन्दावन तरु-तरु तरे - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (96)

वृन्दावन तरु-तरु तरे, ढरै नैन सुख नीर।
चिंतत फिरै आबेस बस, स्यामल-गौर सरीर॥

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (96)

श्री वृन्दावन के वृक्षों की छाया तले प्राणधन, जीवन-सर्वस्व गौर-श्याम का चिंतन करता फिरूँ और मेरे नयनों से प्रेमाश्रु निरंतर झरते रहें।