बड़े भाग्य पग पंकज पेखौं - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (52)

बड़े भाग्य पग पंकज पेखौं - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (52)

बड़े भाग्य पग पंकज पेखौं। [1]
मुक्ति भुक्ति सुख-दुख सम लागैं, आपनि और न देखौं।। [2]
डोलत मस्त दिवानी बन-बन, डगर-बगर नहिं पेखौं। [3]
तन मन पल-पल वारौं भोरी, नित नव जोवन लेखौं।। [4]

- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (52)

श्री भोरी सखी कह रही हैं "मेरे बड़े सौभाग्य हैं जो मुझे श्री राधा के चरण कमलों का दर्शन प्राप्त हुआ। [1]
जिसके समक्ष मुझे मुक्ति-भुक्ति एवं सुख-दुःख समान प्रतीत हो रहे हैं, और तो क्या, मुझे अपने शरीर की भी सुध-बुध नहीं है। [2]
"श्री राधा रानी के दिव्य चरण कमलों के चिंतन में मैं मस्त दीवानी बन कर वृन्दावन की गलियों में विचरण कर रही हूँ, मुझे रास्ते के कंकर पत्थर भी दिखाई नहीं दे रहे हैं। [3]
श्री भोरी सखी कह रही हैं "श्री राधा के नित्य नवीन रूप सौंदर्य को देख मैं पल पल अपने मन प्राण को न्योछावर करती हूँ।" [4]