मैं घनश्याम को देखता जा रहा हूँ।
उसी झलक पर खिंचा जा रहा हूँ॥[1]
लुटाता है वह, मैं लुटा जा रहा हूँ।
मिटाता है वह, मैं मिटा जा रहा हूँ॥ [2]
खबर कुछ नहीं है कहाँ जा रहा हूँ।
बुलाता है वह मैं चला जा रहा हूँ। [3]
मोहब्बत से मैं यूं चला जा रहा हूँ।
निगाहों में उसकी बसा जा रहा हूँ॥ [4]
पता प्रेम के सिन्धु का पा रहा हूँ।
कि एक बिन्दु में ही बहा जा रहा हूँ॥ [5]
- श्री बिंदु जी, मोहन मोहिनी
मैं श्री कृष्ण को नित्य निहार रहा हूँ। मैं उनकी झलकियों पर मुग्ध हो रहा हूँ। [1]
जैसे ही मैंने श्याम सुंदर की ओर देखा, उन्होंने मेरा सब कुछ लूट लिया और मैं लुटा जा रहा हूँ। [2]
मुझे कुछ पता नहीं है कि मैं कहाँ जा रहा हूँ। वह जहां भी बुला रहे हैं, मैं बस चला जा रहा हूँ। [3]
मैं उनके प्रेम में इस प्रकार चला जा रहा हूँ कि मैं निरन्तर उनकी आँखों में बसा जा रहा हूँ। [4]
अब मुझे प्रेम के अमृत के सागर के बारे में इस प्रकार जानकारी मिल गयी है कि मैं प्रेम की एक बूंद में ही डूबा जा रहा हूँ। [5]
उसी झलक पर खिंचा जा रहा हूँ॥[1]
लुटाता है वह, मैं लुटा जा रहा हूँ।
मिटाता है वह, मैं मिटा जा रहा हूँ॥ [2]
खबर कुछ नहीं है कहाँ जा रहा हूँ।
बुलाता है वह मैं चला जा रहा हूँ। [3]
मोहब्बत से मैं यूं चला जा रहा हूँ।
निगाहों में उसकी बसा जा रहा हूँ॥ [4]
पता प्रेम के सिन्धु का पा रहा हूँ।
कि एक बिन्दु में ही बहा जा रहा हूँ॥ [5]
- श्री बिंदु जी, मोहन मोहिनी
मैं श्री कृष्ण को नित्य निहार रहा हूँ। मैं उनकी झलकियों पर मुग्ध हो रहा हूँ। [1]
जैसे ही मैंने श्याम सुंदर की ओर देखा, उन्होंने मेरा सब कुछ लूट लिया और मैं लुटा जा रहा हूँ। [2]
मुझे कुछ पता नहीं है कि मैं कहाँ जा रहा हूँ। वह जहां भी बुला रहे हैं, मैं बस चला जा रहा हूँ। [3]
मैं उनके प्रेम में इस प्रकार चला जा रहा हूँ कि मैं निरन्तर उनकी आँखों में बसा जा रहा हूँ। [4]
अब मुझे प्रेम के अमृत के सागर के बारे में इस प्रकार जानकारी मिल गयी है कि मैं प्रेम की एक बूंद में ही डूबा जा रहा हूँ। [5]

