(राग केदारौ)
प्यारी पहिरैं चुनरी।
तैसोई लहँगा बन्यौ सिलसिलौ
पूरनमासी की सी पूनरी ॥ [1]
हौं जु कहति चलिये मनमोहन मानैंगी नहिं घूनरी । [2]
श्रीहरिदास के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी
चरन लपटाने दुहूँन री॥ [3]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (49)
प्रिया प्रियतम निकुंज में विराज रहे हैं। प्यारी की अंग अंग की संदरता अद्वितीय है। आनंद रस बरस रहा है। प्यारे तो उन पर न्योछावर हो रहे हैं किंतु प्यारी तो बोल ही नहीं रही। प्यारे जी समझ गये वे मान में हैं।
सखी प्यारी की रुचि समझ प्यारे से बोली- हे प्यारे, प्यारी जी चुनरी ओढ़ी हैं, कैसी? गोरे तन पर लाल सुख रंग की चुनरी है, मन मोह रही है। लाल रंग हरि के अनुराग का प्रतीक है; प्यारी के गोरे रंग की झलक आनन्द का। ऐसी सुंदर चुनर है, तुम मान मन समझो। लहंगा भी चुनरी रंग का प्यारी जी ने पहन रखा है। उनकी अंग-अंग की झलक मानो लाल के मन की ललक हो। लाल जी प्यारी के मुख को निरख-निरख प्रसन्न हो रहे हैं। चिकने लहंगे के ऊपर भड़कीली कंचुकी श्याम रंग की शोभा पा रही है, मानो पूर्णमासी का चंद्रमा श्याम रंग बादलों से प्रकट हो गया हो। [1]
सखी कह रही है- कुंजबिहारी प्यारी जी तो प्रसन्न दीख रही हैं। मनमोहन! तुम तो इनके मन को मोहने वाले हो। जो कुछ कहोगे, वे अवश्य मानेंगी। वे चुप्पी साधे हैं, अपने मन का भाव गुप्त रखती हैं, परंतु वे रस मगन हैं, तुम सकुचाओ मत। [2]
हरिदासजी की स्वामिनी श्यामा जी के दोनों चरण कमलों से हरि लिपट गये। कहने लगे -मुझे कुछ सुहाता नहीं। मेरे लिए बस आपही सर्वस्व हैं। [3]
प्यारी पहिरैं चुनरी।
तैसोई लहँगा बन्यौ सिलसिलौ
पूरनमासी की सी पूनरी ॥ [1]
हौं जु कहति चलिये मनमोहन मानैंगी नहिं घूनरी । [2]
श्रीहरिदास के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी
चरन लपटाने दुहूँन री॥ [3]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (49)
प्रिया प्रियतम निकुंज में विराज रहे हैं। प्यारी की अंग अंग की संदरता अद्वितीय है। आनंद रस बरस रहा है। प्यारे तो उन पर न्योछावर हो रहे हैं किंतु प्यारी तो बोल ही नहीं रही। प्यारे जी समझ गये वे मान में हैं।
सखी प्यारी की रुचि समझ प्यारे से बोली- हे प्यारे, प्यारी जी चुनरी ओढ़ी हैं, कैसी? गोरे तन पर लाल सुख रंग की चुनरी है, मन मोह रही है। लाल रंग हरि के अनुराग का प्रतीक है; प्यारी के गोरे रंग की झलक आनन्द का। ऐसी सुंदर चुनर है, तुम मान मन समझो। लहंगा भी चुनरी रंग का प्यारी जी ने पहन रखा है। उनकी अंग-अंग की झलक मानो लाल के मन की ललक हो। लाल जी प्यारी के मुख को निरख-निरख प्रसन्न हो रहे हैं। चिकने लहंगे के ऊपर भड़कीली कंचुकी श्याम रंग की शोभा पा रही है, मानो पूर्णमासी का चंद्रमा श्याम रंग बादलों से प्रकट हो गया हो। [1]
सखी कह रही है- कुंजबिहारी प्यारी जी तो प्रसन्न दीख रही हैं। मनमोहन! तुम तो इनके मन को मोहने वाले हो। जो कुछ कहोगे, वे अवश्य मानेंगी। वे चुप्पी साधे हैं, अपने मन का भाव गुप्त रखती हैं, परंतु वे रस मगन हैं, तुम सकुचाओ मत। [2]
हरिदासजी की स्वामिनी श्यामा जी के दोनों चरण कमलों से हरि लिपट गये। कहने लगे -मुझे कुछ सुहाता नहीं। मेरे लिए बस आपही सर्वस्व हैं। [3]

