गोकुलेन्द्र सुनूमत्त भृंग चारु मल्लिकां, शुद्ध भावना स्वकीय भक्ति कल्प वल्लिकाम्।
नव्य यौवन प्रमोद मंजुमन्द भाषिणीं, राधिका महं भजे निकुञ्ज धाम वासिनीम्॥
- श्री मोहनचंद जी, श्री राधिकाष्टकम (1)
हे श्री राधिका, आप अति सुन्दर चमेली के पुष्प समान हैं, जिस पर गोकुल के स्वामी श्री कृष्ण की आँखें (भृंग के समान मत्त) टिकी हैं । शुद्धतम प्रेम की भावना जो आपकी भक्ति का एक लक्षण है वह एक विचित्र कल्प लता की तरह है। आप नित्य किशोरी हैं, आनन्दमय हैं एवं आपका समवाद अति मृदुल एवं मन मोहने वाला है। हे निकुञ्ज धाम वासिनी श्री राधिका जू, मैं आपको नमन करता हूँ।
नव्य यौवन प्रमोद मंजुमन्द भाषिणीं, राधिका महं भजे निकुञ्ज धाम वासिनीम्॥
- श्री मोहनचंद जी, श्री राधिकाष्टकम (1)
हे श्री राधिका, आप अति सुन्दर चमेली के पुष्प समान हैं, जिस पर गोकुल के स्वामी श्री कृष्ण की आँखें (भृंग के समान मत्त) टिकी हैं । शुद्धतम प्रेम की भावना जो आपकी भक्ति का एक लक्षण है वह एक विचित्र कल्प लता की तरह है। आप नित्य किशोरी हैं, आनन्दमय हैं एवं आपका समवाद अति मृदुल एवं मन मोहने वाला है। हे निकुञ्ज धाम वासिनी श्री राधिका जू, मैं आपको नमन करता हूँ।

