व्यास सु रसिकन की रहनी - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (37)

व्यास सु रसिकन की रहनी - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (37)

व्यास सु रसिकन की रहनी, बहुत कठिन है वीर।
मन आनंद घटे ना छिन्न, सहें जगत की पीर॥

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (37)

हे भाई! रसिकों की रहनी (रसिक कहलाना) अत्यंत कठिन है, क्योंकि संसार की समस्त कठिनताओं को सहते हुए भी उनका मन श्री राधा-कृष्ण के युगल-रस में नित्य ही डूबा रहता है; अर्थात उनका आनंद एक क्षण के लिए भी कम नहीं होता।