कृष्ण कृपा आए दिन भले ।
बहुतैं भ्रमयौं आज लौं हौं अब वृंदावन दिशि चरन चले।। [1]
दुर्जन टरे सज्जन मिली हैं जे नंदनंदन कै रंग रले ।
भूखे हुते श्रवण मन लोचन, ते नागर रस पोष पले ।। [2]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (85)
श्री नागरीदास जी कह रहे हैं "आज तक मैं संसार के भ्रम मे बहुत भटकता रहा, परंतु अब श्री कृष्ण की अहेतु की कृपा हुई और अब मेरे भले दिन आ गए हैं क्यूँकि मेरे कदम अब श्री वृन्दावन की दिशा की ओर चल पड़े हैं। [1]
दुष्टों का संग अब छूट गया है ओर सज्जनों का संग प्राप्त होगा, जो श्री कृष्ण के प्रेम रंग मे रंगे हुए हैं। मेरे श्रवण, मन एवं मेरी आँखें श्री राधा कृष्ण के प्रेम के लिए तरस रहे थे, जो अब श्री कृष्ण कृपा से सुलभ हो गया है।" [2]
बहुतैं भ्रमयौं आज लौं हौं अब वृंदावन दिशि चरन चले।। [1]
दुर्जन टरे सज्जन मिली हैं जे नंदनंदन कै रंग रले ।
भूखे हुते श्रवण मन लोचन, ते नागर रस पोष पले ।। [2]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (85)
श्री नागरीदास जी कह रहे हैं "आज तक मैं संसार के भ्रम मे बहुत भटकता रहा, परंतु अब श्री कृष्ण की अहेतु की कृपा हुई और अब मेरे भले दिन आ गए हैं क्यूँकि मेरे कदम अब श्री वृन्दावन की दिशा की ओर चल पड़े हैं। [1]
दुष्टों का संग अब छूट गया है ओर सज्जनों का संग प्राप्त होगा, जो श्री कृष्ण के प्रेम रंग मे रंगे हुए हैं। मेरे श्रवण, मन एवं मेरी आँखें श्री राधा कृष्ण के प्रेम के लिए तरस रहे थे, जो अब श्री कृष्ण कृपा से सुलभ हो गया है।" [2]

