वृंदावन की शोभा देखे - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (6)

वृंदावन की शोभा देखे - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (6)

(राग सारंग)
वृंदाबन की सोभा देखे मेरे नैन सिरात।
कुंज निकुंज पुंज सुख बरसत हरषत सबकौ गात॥ [1]
राधा मोहनके निज मंदिर महाप्रलय नहीं जात।
ब्रह्मातें उपज्यो न अखंडित कबहूँ नाहिं नसात॥ [2]
फनिपर रवि तरि नहिं बिराट महँ नहिं संध्या नहिं प्रात।
माया कालरहित नित नूतन सदा फूल फल पात॥ [3]
निरगुन सगुन ब्रह्मतें न्यारौ बिहरत सदा सुहात।
ब्यास बिलास रास अद्भुत गति, निगम अगोचर बात॥ [4]

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (6)

श्री हरिराम व्यास कहते हैं "वृन्दावन की कुञ्ज एवं निकुंजों में अद्भुत सुख की वर्षा हो रही है, जिसके गान से मेरे ह्रदय में बड़ा भारी हर्ष हो रहा है, वृन्दावन की यह शोभा देखकर नयन अश्रु पूरित हो रही हैं एवं आनंद रस से शीतल बने रहते हैं।" [1]

महाप्रलय के समय ब्रह्मा जी की पूर्ण सृष्टि नष्ट हो जाती है, परंतु इसकी आंच वृन्दावन कभी नहीं आती, जहाँ श्री राधा मोहन सुख पूर्वक विराज रहे हैं क्यूंकि यह ब्रह्मा जी द्वारा नहीं प्रकट हुआ। [2]

यह न तो शेषनाग के फण पर स्थित है, न सूर्य के नीचे है, न विराट के अंदर और न ही इसमें रात दिन होते हैं । यह दिव्य धाम माया काल से रहित है इसलिए यहाँ के फूल फल एवं पत्ते सदा नित्य नूतन रहते हैं । [3]

श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि श्री वृन्दावन मे श्री राधा कृष्ण का स्वरूप निर्गुण एवं सगुण ब्रह्म से विलक्षण है जो सदा नित्य विहार करते रहते हैं । इनका रास विलास आगम निगम से अगोचर हैं और अद्भुत गति वाला है । [4]