(मूलताल पंचम ख्याल)
ए री रूप-अगाधे राधे, राधे राधे राधे राधे। [1]
तेरे मिलिबे कों ब्रजमोहन बहुत जतन हैं साधे। [2]
उनकें निसिदिन लगी रहै जक तू न धरति पल आधे। [3]
आनँदघन पिय चातक चोंपनि हा राधे आराधे॥ [4]
- श्री आनन्दघन जी, पदावली (234)
हे श्री राधे, ब्रजमोहन श्री श्यामसुंदर आपसे मिलने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं, और केवल राधे राधे की पुकार कर रहें हैं। [1 & 2]
उनको रात-दिन केवल आपसे मिलने की आस है, और यहाँ आप आधा पल भी उनका विचार नहीं कर रही हैं। [3]
आनँदघन कह रहे हैं "जैसे चातक वर्षा के बूंदों की आस में आकाश की ओर देखता है, उसी प्रकार श्री श्यामसुंदर आपकी आस में 'हा राधे, हा राधे' पुकार कर रहे हैं।" [4]
ए री रूप-अगाधे राधे, राधे राधे राधे राधे। [1]
तेरे मिलिबे कों ब्रजमोहन बहुत जतन हैं साधे। [2]
उनकें निसिदिन लगी रहै जक तू न धरति पल आधे। [3]
आनँदघन पिय चातक चोंपनि हा राधे आराधे॥ [4]
- श्री आनन्दघन जी, पदावली (234)
हे श्री राधे, ब्रजमोहन श्री श्यामसुंदर आपसे मिलने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं, और केवल राधे राधे की पुकार कर रहें हैं। [1 & 2]
उनको रात-दिन केवल आपसे मिलने की आस है, और यहाँ आप आधा पल भी उनका विचार नहीं कर रही हैं। [3]
आनँदघन कह रहे हैं "जैसे चातक वर्षा के बूंदों की आस में आकाश की ओर देखता है, उसी प्रकार श्री श्यामसुंदर आपकी आस में 'हा राधे, हा राधे' पुकार कर रहे हैं।" [4]

