रसमय देखत फिरै बन, नैनन बन रहै आइ।
कहुँ-कहुँ आनंद रंग भरि, परै धरनि थहराइ॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (94)
रसिक उपासक श्री वृन्दावन को रसस्वरूप मानकर विचरण करता है; उसके नयनों में वन की छवि बसी रहती है। कभी-कभी प्रेमावेशवश वह पृथ्वी पर गिर पड़ता है।
कहुँ-कहुँ आनंद रंग भरि, परै धरनि थहराइ॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (94)
रसिक उपासक श्री वृन्दावन को रसस्वरूप मानकर विचरण करता है; उसके नयनों में वन की छवि बसी रहती है। कभी-कभी प्रेमावेशवश वह पृथ्वी पर गिर पड़ता है।

