(राग कल्यान)
कस्तूरी कौ मर्दन अंग में कियैं मुरली धरैं पीताम्बर ओढ़ैं कहति राधे हौं ही स्याम। [1]
किसोर कुमकुम कौ सिंगार कियैं सारी चुरी खुभी नेत्रनि दियैं स्याम॥ [2]
बाँह गहि लै चलै चलियै जू कुंज में चितै मुख हँसें मानौं एई स्याम। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्याम छाती सौं छाती लगायें गौर स्याम॥ [4]
- श्री स्वामी हरिदास जी, केलिमाल (56)
कुंजमहल में हरिदास जी पिय प्यारी को नये-नये लाड़ लड़ा रही हैं। इस सुख आनंद की चर्चा सखीजन आपस में कह रही हैं।
सखी कहती है- राधे जी ने श्री श्याम का श्रृंगार किया है। गौर वर्ण पर कस्तूरी का मर्दन कर, पीताम्बर धारण किया है तथा मुरली मुख पर धरी हैं। राधे जी कहती हैं मैं तो पिय, श्याम बन गई। [1]
प्यारेजी ने साड़ी पहनी है। हाथों में चार चार चूड़ियाँ शोभित हो रही है तथा नयनों में श्याम-काजल लगा, कुमकुम का शृंगार किया है। इस प्रकार दोनों के वेष पलट गये हैं। [2]
प्रिय रूप प्रिया की प्यारी, रूप प्रिय ने बाँह पकड़ ली, कहा - चलिए कुंजों में प्यारीजी इस भांति हँसी कर रही हैं जैसे पिय हों, भौहें, नैन, बातें सभी प्रिय की भांति हैं। [3]
श्री हरिदास के स्वामी श्यामा जी पिय बनी प्यारी बने श्याम को हृदय से हृदय लगा आनंदरस में डूबे हैं। लाल जी निहाल हो प्रेम रस में पगे हैं। प्रियाजी पिय के प्रेम की पोषक तथा महा आनन्द प्रदान करने वाली महासुख राशि की पुंज हैं। [4]
कस्तूरी कौ मर्दन अंग में कियैं मुरली धरैं पीताम्बर ओढ़ैं कहति राधे हौं ही स्याम। [1]
किसोर कुमकुम कौ सिंगार कियैं सारी चुरी खुभी नेत्रनि दियैं स्याम॥ [2]
बाँह गहि लै चलै चलियै जू कुंज में चितै मुख हँसें मानौं एई स्याम। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्याम छाती सौं छाती लगायें गौर स्याम॥ [4]
- श्री स्वामी हरिदास जी, केलिमाल (56)
कुंजमहल में हरिदास जी पिय प्यारी को नये-नये लाड़ लड़ा रही हैं। इस सुख आनंद की चर्चा सखीजन आपस में कह रही हैं।
सखी कहती है- राधे जी ने श्री श्याम का श्रृंगार किया है। गौर वर्ण पर कस्तूरी का मर्दन कर, पीताम्बर धारण किया है तथा मुरली मुख पर धरी हैं। राधे जी कहती हैं मैं तो पिय, श्याम बन गई। [1]
प्यारेजी ने साड़ी पहनी है। हाथों में चार चार चूड़ियाँ शोभित हो रही है तथा नयनों में श्याम-काजल लगा, कुमकुम का शृंगार किया है। इस प्रकार दोनों के वेष पलट गये हैं। [2]
प्रिय रूप प्रिया की प्यारी, रूप प्रिय ने बाँह पकड़ ली, कहा - चलिए कुंजों में प्यारीजी इस भांति हँसी कर रही हैं जैसे पिय हों, भौहें, नैन, बातें सभी प्रिय की भांति हैं। [3]
श्री हरिदास के स्वामी श्यामा जी पिय बनी प्यारी बने श्याम को हृदय से हृदय लगा आनंदरस में डूबे हैं। लाल जी निहाल हो प्रेम रस में पगे हैं। प्रियाजी पिय के प्रेम की पोषक तथा महा आनन्द प्रदान करने वाली महासुख राशि की पुंज हैं। [4]

