(सुरत - केलि)
भाँति भली नवकुंज विराजत , राधिका वल्लभ लाल बिहारी। [1]
प्राननि की मनि प्यारी बिहारिनि, प्यार सौं प्रीतम लै उर धारी॥ [2]
ज्यौं छबि - चंद्रिका चंद के अंक में, बाढ़ी महा छबि की उजियारी। [3]
सखी चहुँ कोद चकोरी भईं 'ध्रुव', पीवत रूप अनूप सुधा री॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत 3.2
आज नव निभृत निकुञ्ज में, रसिक श्री राधिका एवं वल्लभ लाल अति सुन्दर छवि से भली भाँति विराजित हैं। [1]
प्रियतम ने नित्य विहारिणि प्रिया को अमूल्य निधि प्राणमणि की भाँति हृदय पर धारण कर रखा है। [2]
उस समय महाछवि के प्रकाश का ऐसा विस्तार हुआ मानो चन्द्रमा की क्रोड़ में छबि रूप ज्योत्सना ही मूर्तिमान् विराज गयी हो। [3]
चारों ओर एकत्रित सखियाँ तृषित चकोरी की भाँति उस अनुपम रूपामृत का पान कर रही हैं। [4]
भाँति भली नवकुंज विराजत , राधिका वल्लभ लाल बिहारी। [1]
प्राननि की मनि प्यारी बिहारिनि, प्यार सौं प्रीतम लै उर धारी॥ [2]
ज्यौं छबि - चंद्रिका चंद के अंक में, बाढ़ी महा छबि की उजियारी। [3]
सखी चहुँ कोद चकोरी भईं 'ध्रुव', पीवत रूप अनूप सुधा री॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत 3.2
आज नव निभृत निकुञ्ज में, रसिक श्री राधिका एवं वल्लभ लाल अति सुन्दर छवि से भली भाँति विराजित हैं। [1]
प्रियतम ने नित्य विहारिणि प्रिया को अमूल्य निधि प्राणमणि की भाँति हृदय पर धारण कर रखा है। [2]
उस समय महाछवि के प्रकाश का ऐसा विस्तार हुआ मानो चन्द्रमा की क्रोड़ में छबि रूप ज्योत्सना ही मूर्तिमान् विराज गयी हो। [3]
चारों ओर एकत्रित सखियाँ तृषित चकोरी की भाँति उस अनुपम रूपामृत का पान कर रही हैं। [4]

