लड़ैती के खंजन लोचना - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (63)

लड़ैती के खंजन लोचना - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (63)

(राग चर्चरी, तीनताल)
लड़ैती के खंजन लोचना।
बिनहीं अंजन दिये बिहारी, बिरह विथा उर मोचना॥ [1]
चपल चाल लालै अवलोकत, रूप लुभाय संकोचना।
जै श्रीभट्ट सुघर सुधीर स्याम कौ, करत निरन्तर रोचना॥ [2]

- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (63)

अद्भुत श्री लड़ैती राधा रानी के नेत्र इतने सुन्दर हैं कि बिना काजल के ही श्री श्यामसुंदर के ह्रदय में विरह उत्पन्न कर रहे हैं। [1]
श्री राधा रानी के नेत्रों की चपल गति को देखकर श्री श्यामसुंदर उनके रूप में लुभा रहे हैं। श्रीभट्ट देवाचार्य कह रहे हैं "श्री राधा रानी के अद्भुत सुन्दर रूप को देख कर परम सुन्दर एवं परम धैर्यवान श्री श्यामसुंदर उनकी रूप माधुरी में आसक्त हुए अति अधीर एवं व्याकुल हो रहे हैं।" [2]