इन्द्र गोप कान्ति हारिम्, चारु शैल धारिणीम्, भ्रूविलास राशि तृष्ण कृष्ण चित्त हारिणीम्।
श्यामसुन्दर प्रमोद वृद्धि, मन्द हासिनीम्, राधिका महं भजे निकुञ्ज धाम वासिनीम्॥
- श्री मोहनचंद जी, श्री राधिकाष्टकम (2)
हे श्री राधिका जू, आपने गिरिराज पर्वत को धारण कर श्री कृष्ण को उसकी छाया में रखा। आपकी भृकुटि की चंचलता श्री कृष्ण के हृदय की तृष्णा का हरण कर लेती है। आपकी मधुर मन्द मुस्कान श्री कृष्ण के आनंद में वृद्धि करती है। हे निकुञ्ज धाम वासिनी श्री राधिका जू, मैं आपको नमन करता हूँ।
श्यामसुन्दर प्रमोद वृद्धि, मन्द हासिनीम्, राधिका महं भजे निकुञ्ज धाम वासिनीम्॥
- श्री मोहनचंद जी, श्री राधिकाष्टकम (2)
हे श्री राधिका जू, आपने गिरिराज पर्वत को धारण कर श्री कृष्ण को उसकी छाया में रखा। आपकी भृकुटि की चंचलता श्री कृष्ण के हृदय की तृष्णा का हरण कर लेती है। आपकी मधुर मन्द मुस्कान श्री कृष्ण के आनंद में वृद्धि करती है। हे निकुञ्ज धाम वासिनी श्री राधिका जू, मैं आपको नमन करता हूँ।

