राधे रसिक सिरोमनि प्यारी है। [1]
अति आनंद भरी सुखरासी छिन हूँ होत न न्यारी है॥ [2]
महा रूप छिन ही छिन बाढे अद्भुत प्रीति सौं भारी है। [3]
श्रीललितकिसोरी तनमन मिलि कै विहरत केलिविहारी है॥ [4]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (67)
श्री राधा रसिक शिरोमणि प्यारी हैं। [1]
श्री राधा आनंद में अति उन्मत्त रहती हैं, सुख की राशी हैं एवं एक क्षण के लिए भी हमसे विलग नहीं होती। [2]
उनका महा रूप (अत्यंत मोहक करने वाला रूप) छिन्न छिन्न नव नवायमान होता है एवं नित्य ही और अधिक मोहक होता रहता है, एवं वह अद्भुत प्रीती से भरी हुई हैं (ऐसी प्रीती जो केवल और केवल श्री राधा में ही है)। [3]
श्री ललित किशोरी कहते हैं कि श्री किशोरीजी एवं बिहारीजी तन मन से मिलकर नित्य ही केलि विहार करते हैं। [4]
अति आनंद भरी सुखरासी छिन हूँ होत न न्यारी है॥ [2]
महा रूप छिन ही छिन बाढे अद्भुत प्रीति सौं भारी है। [3]
श्रीललितकिसोरी तनमन मिलि कै विहरत केलिविहारी है॥ [4]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (67)
श्री राधा रसिक शिरोमणि प्यारी हैं। [1]
श्री राधा आनंद में अति उन्मत्त रहती हैं, सुख की राशी हैं एवं एक क्षण के लिए भी हमसे विलग नहीं होती। [2]
उनका महा रूप (अत्यंत मोहक करने वाला रूप) छिन्न छिन्न नव नवायमान होता है एवं नित्य ही और अधिक मोहक होता रहता है, एवं वह अद्भुत प्रीती से भरी हुई हैं (ऐसी प्रीती जो केवल और केवल श्री राधा में ही है)। [3]
श्री ललित किशोरी कहते हैं कि श्री किशोरीजी एवं बिहारीजी तन मन से मिलकर नित्य ही केलि विहार करते हैं। [4]

