जबते राधिका भूतल प्रगटी - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (893)

जबते राधिका भूतल प्रगटी - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (893)

(राग बिलावल)
जबते राधिका भूतल प्रगटी।
तबते विधि को मान हन्यो।
मेरी तो यह सृष्टि न होई अब कछु अद्भुत बान बन्यौ॥1॥
एक रूप एक वेष एक गुन वरन विलक्ष्यण ठन्यो।
कृष्णदास प्रभु श्री गिरधर ते केलि कला रस सरस सन्यो॥2॥

- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (893)

जब से श्री राधिका जी इस धरती पर प्रकट हुईं, तब से सृष्टिकर्ता ब्रह्मा का मान भंग हुआ है। ब्रह्मा जी विचार कर रहे हैं "यह अब मेरी रचना नहीं है - कुछ असाधारण और अद्वितीय दिखाई दिया है। [1]

उनका रूप, पोशाक और चरित्र श्री कृष्ण के सामान है, फिर भी उनका वर्ण विलक्षण है।" कवि श्री कृष्णदास कहते हैं "श्री राधा जी एवं श्री गिरधर जी के केलि कला रस एक दूसरे से मिल कर सराबोर हो चुके हैं।" [2]