जीरन पट अति दीन लट, हिये सरस अनुराग।
विवस सघन बन में फिरै, गावत युगल सुहाग॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (93)
चाहे तन पर फटे-पुराने वस्त्र हों, देह क्षीण हो और सर्वथा दीन दशा हो; परन्तु हृदय युगल-प्रेमरस से सरोबार हो और उसी प्रेमाधिक्यवश वह वृन्दावन की करील-कुंजों में युगल-यश का गान करता हुआ विचरण करे।
विवस सघन बन में फिरै, गावत युगल सुहाग॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (93)
चाहे तन पर फटे-पुराने वस्त्र हों, देह क्षीण हो और सर्वथा दीन दशा हो; परन्तु हृदय युगल-प्रेमरस से सरोबार हो और उसी प्रेमाधिक्यवश वह वृन्दावन की करील-कुंजों में युगल-यश का गान करता हुआ विचरण करे।

