साधन की आस सदाँ - श्री लाल बलबीर, श्री राधा शतक (87)

साधन की आस सदाँ - श्री लाल बलबीर, श्री राधा शतक (87)

साधन की आस सदाँ सिद्ध ही करन हारे,
अष्ट सिद्ध निद्ध देत रक्षा के करन हैं। [1]
जाके ध्यान धरत सरत जन काज नीके,
जाके त्रास नासे हैं दरिद्र के हरन हैं॥ [2]
दास कहैं करत निहाल ततकाल हाल,
जिनकी सरन लेत रंचिक डर न हैं। [3]
धीरज धरन हारे ऐसे ना निहारे जैसे,
तारन तरन (श्री) राधा रानी के चरन हैं॥ [4]

- श्री लाल बलबीर, श्री राधा शतक (87)

श्री राधा रानी के चरण कमल उनकी अनन्य शरणागति के बिना उन साधकों के लिए, जो अपने साधन की आस लेकर बैठे हैं, एवं सिद्ध महापुरुषों तक के लिए दुर्लभ हैं, परंतु जो उनकी अनन्य शरण में हैं, उनके लिए चरण कमल सुलभ हैं, और बिन साधन ही ये चरण अष्ट सिद्धियाँ एवं नवों निधियाँ प्रदान करने वाली हैं और उनकी नित्य रक्षा करने वाले हैं। [1]

श्री राधा रानी के चरण कमलों का ध्यान करते ही वे हृदय में विराजमान हो, सारथी की भांति समस्त कार्य सहजता से सम्पन्न कर देते हैं, कष्टों को दूर करते हैं और दरिद्रता का हरण कर लेते हैं। [2]

जिनकी शरण में जाने से रंचमात्र भी हृदय में भय नहीं रह जाता, ऐसे श्री राधा रानी के चरण कमलों का दासत्व स्वीकार करते ही तत्क्षण वे हृदय को निहाल कर देते हैं। [3]

श्री राधा रानी के चरण कमल के दर्शन से बड़े-बड़े धैर्यवान भी अपना धीरज इस प्रकार हार चुके हैं, जैसे कभी ऐसे चरण कमल के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त न हुआ हो। जो सब को संसार से तारते हैं, उन्हें भी तारने वाले हैं श्री राधा रानी के चरण कमल। [4]