राधे तेरे रूप की, पटतर कहिये काहि।
कमल कोस अलि ज्यों चलै, नैन कोर तन चाहि॥
- ब्रज के दोहे
हे श्री राधे! आपकी सुंदरता का पूर्ण वर्णन करने में कोई भी समर्थ नहीं है। जैसे कोई भ्रमर कमल-पुष्प की पंखुड़ियों को छोड़कर उसके मध्य-कोष की ओर आकर्षित हो जाता है, वैसे ही आपके नयन-कटाक्ष का दर्शन होते ही और कुछ दिखाई नहीं देता।
कमल कोस अलि ज्यों चलै, नैन कोर तन चाहि॥
- ब्रज के दोहे
हे श्री राधे! आपकी सुंदरता का पूर्ण वर्णन करने में कोई भी समर्थ नहीं है। जैसे कोई भ्रमर कमल-पुष्प की पंखुड़ियों को छोड़कर उसके मध्य-कोष की ओर आकर्षित हो जाता है, वैसे ही आपके नयन-कटाक्ष का दर्शन होते ही और कुछ दिखाई नहीं देता।

