(राग सारंग एवं विहागरौ)
बलि बलि हौं कुँवरि राधिका
नन्दसुवन जासों रति मानी ।
वे अतिचुर तुम चतुर-सिरोमनी
प्रीति करी कैसे रहे छानी ॥1॥
वे जो धरत तन कनक पीट पत
सो तो सब तेरी गति ठानी ।
तें पुनि स्याम सहज यह सोभा
अंबर मिस अपेन उर आनी ॥2॥
पुलकित अङ्ग अब ही व्है आयो
निरखि सुभग निज देह सयानी ।
'सूर' सुजान सखी के बूझे
प्रेम प्रकास भयो विहँसानी ॥3॥
- श्री सूरदास जी, सूर सागर
भावार्थ:
मैं अपने जीवन और आत्मा को बार-बार श्री राधिका को समर्पण करता हूँ। श्री राधिका, जिन्हें नंद के पुत्र श्रीकृष्ण प्यार करते है। श्री कृष्ण चतुर हैं, आप (श्री राधिका) चतुर शिरोमणि हैं आप प्रीति किये बिना अर्थात एक दूसरे से अलग कैसे रह सकते हैं? [1]
वो (श्री कृष्ण) आप (श्री राधिका) के सुनहरे शरीर को पीले वस्त्र से ढकते हैं, परन्तु आपका प्रेम छुपाये नहीं छुपता। जब आप (श्री राधिका) उन (श्री कृष्ण) के शरीर, जो कि नीले (बादल की तरह नीले) वर्ण के हैं, को अपने नील वस्त्रों में लेकर अपने ह्रदय में छुपा लेती हैं तो वे (श्री कृष्ण) पूर्णतया ढक जाते हैं। [2]
जब आप (श्री कृष्ण) श्री राधिका को देखते हैं तब आप (श्री कृष्ण) पुलकायमान हो जाते हैं। श्री सूरदास जी कहते हैं, "जब सखी आप (श्री राधिका) से श्री कृष्ण के बारे में पूछती हैं तब आपकी मुस्कान सब कुछ दर्शाती हैं। [3]
बलि बलि हौं कुँवरि राधिका
नन्दसुवन जासों रति मानी ।
वे अतिचुर तुम चतुर-सिरोमनी
प्रीति करी कैसे रहे छानी ॥1॥
वे जो धरत तन कनक पीट पत
सो तो सब तेरी गति ठानी ।
तें पुनि स्याम सहज यह सोभा
अंबर मिस अपेन उर आनी ॥2॥
पुलकित अङ्ग अब ही व्है आयो
निरखि सुभग निज देह सयानी ।
'सूर' सुजान सखी के बूझे
प्रेम प्रकास भयो विहँसानी ॥3॥
- श्री सूरदास जी, सूर सागर
भावार्थ:
मैं अपने जीवन और आत्मा को बार-बार श्री राधिका को समर्पण करता हूँ। श्री राधिका, जिन्हें नंद के पुत्र श्रीकृष्ण प्यार करते है। श्री कृष्ण चतुर हैं, आप (श्री राधिका) चतुर शिरोमणि हैं आप प्रीति किये बिना अर्थात एक दूसरे से अलग कैसे रह सकते हैं? [1]
वो (श्री कृष्ण) आप (श्री राधिका) के सुनहरे शरीर को पीले वस्त्र से ढकते हैं, परन्तु आपका प्रेम छुपाये नहीं छुपता। जब आप (श्री राधिका) उन (श्री कृष्ण) के शरीर, जो कि नीले (बादल की तरह नीले) वर्ण के हैं, को अपने नील वस्त्रों में लेकर अपने ह्रदय में छुपा लेती हैं तो वे (श्री कृष्ण) पूर्णतया ढक जाते हैं। [2]
जब आप (श्री कृष्ण) श्री राधिका को देखते हैं तब आप (श्री कृष्ण) पुलकायमान हो जाते हैं। श्री सूरदास जी कहते हैं, "जब सखी आप (श्री राधिका) से श्री कृष्ण के बारे में पूछती हैं तब आपकी मुस्कान सब कुछ दर्शाती हैं। [3]

