नारायण अति कठिन है, हरि मिलिबे की बाट।
या मारग तब पग धरै, प्रथम शीश दे काट॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (126)
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि श्री हरि से मिलने का मार्ग अत्यंत दुर्गम और कठिन है। इस प्रेम-मार्ग पर कोई साधक तभी अपने कदम रख सकता है, जब वह सर्वप्रथम अपने शीश को काटकर समर्पित कर दे अर्थात् बिना पूर्ण आत्म-समर्पण और अहंकार के त्याग के इस पथ पर चलना असंभव है।
या मारग तब पग धरै, प्रथम शीश दे काट॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (126)
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि श्री हरि से मिलने का मार्ग अत्यंत दुर्गम और कठिन है। इस प्रेम-मार्ग पर कोई साधक तभी अपने कदम रख सकता है, जब वह सर्वप्रथम अपने शीश को काटकर समर्पित कर दे अर्थात् बिना पूर्ण आत्म-समर्पण और अहंकार के त्याग के इस पथ पर चलना असंभव है।

