अब कछु बाधा नाहिं रही - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, , पदावली (86)

अब कछु बाधा नाहिं रही - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, , पदावली (86)

(राग रामकली)
अब कछु बाधा नाहिं रही।
मदन गुपाल मिले सुखदायक साधा सबै लही। [1]
रोम रोम अति हरष भयौ है जीवन सफल सही।
आनँदघन या रस की संपति कैसें परति कही।। [2]

- श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (86)

अब कोई बाधा नहीं रह गयी है, क्यूँकि अब मुझे मदन गोपाल मिल गए हैं, सारे साधन सफल हो गए हैं। [1]
मेरा रोम रोम अति हर्षित हो रहा है, जीवन सफल हो गया है। आनँदघन कह रहे हैं "इस रस को कैसे कहा जाए, कहते नहीं बनता।" [2]