मोहन छबि रसखानि लखि - श्री रसखान

मोहन छबि रसखानि लखि - श्री रसखान

मोहन छबि रसखानि लखि, अब दृग अपने नाहिं।
ऐंचे आवत धनुष से, छूटे सर से जाहिं॥

- श्री रसखान

मनमोहन श्रीकृष्ण के रूप-दर्शन कर लेने के बाद अब ये आँखें अपनी नहीं रहीं; वे उसी प्रकार परवश हो गई हैं, जैसे धनुष से निकला हुआ तीर।