(राग बिलावल)
अति ही अरुन तेरे नयन नलिन री। [1]
आलस जुत इतरात रँगमगे,
भये निसि जागर मषिन मलिन री॥ [2]
सिथिल पलक में उठति गोलक गति,
बिंधयौ मोंहन मृग सकत चलि न री। [3]
(जै श्री) हित हरिवंश हंस कल गामिनि,
संभ्रम देत भ्रमरनि अलिन री॥ [4]
- श्री हरिवंश महाप्रभू, श्री हित चौरासी (8)
भावार्थ - अरी सखि ! आज तुम्हारे नयन कमल बड़े अरुणिम हैं। [1]
रात्रि भर विलास एवं जागरण के चाव से अत्यन्त आलस्य युक्त हो रहे हैं। मिलन के गौरव से गर्वित, प्रेम रंग से छलक रहे हैं एवं कज्जल रंजित श्यामलता से शोभित है। [2]
सम्मोहन कारी नयनों की थकित पलकों में युग गोलक की मंथर गति ने मोहन मृग (श्रीश्याम सुन्दर) को वेध सा दिया है वे रस मुग्ध अवस्था में गति हीन से हो गये हैं। [3]
श्रीहित हरिवंश कहते हैं- हे मरालवत् सुन्दर गति शीले ! तुम तो एक ओर भ्रमरों को अपने नेत्रों की सुन्दरता से कमल का संभ्रम उत्पन्न कर रही हो तथा दूसरी ओर अपनी सुन्दर मराल गति द्वारा सखियों से रात्रि के रति विलास के गोपन की चेष्टा करती हुई प्रिय संगम के रहस्य का संशय उत्पन्न कर रही हो मानो कि तुमने प्रियतम से समागम ही प्राप्त नहीं किया हो। [4]
अति ही अरुन तेरे नयन नलिन री। [1]
आलस जुत इतरात रँगमगे,
भये निसि जागर मषिन मलिन री॥ [2]
सिथिल पलक में उठति गोलक गति,
बिंधयौ मोंहन मृग सकत चलि न री। [3]
(जै श्री) हित हरिवंश हंस कल गामिनि,
संभ्रम देत भ्रमरनि अलिन री॥ [4]
- श्री हरिवंश महाप्रभू, श्री हित चौरासी (8)
भावार्थ - अरी सखि ! आज तुम्हारे नयन कमल बड़े अरुणिम हैं। [1]
रात्रि भर विलास एवं जागरण के चाव से अत्यन्त आलस्य युक्त हो रहे हैं। मिलन के गौरव से गर्वित, प्रेम रंग से छलक रहे हैं एवं कज्जल रंजित श्यामलता से शोभित है। [2]
सम्मोहन कारी नयनों की थकित पलकों में युग गोलक की मंथर गति ने मोहन मृग (श्रीश्याम सुन्दर) को वेध सा दिया है वे रस मुग्ध अवस्था में गति हीन से हो गये हैं। [3]
श्रीहित हरिवंश कहते हैं- हे मरालवत् सुन्दर गति शीले ! तुम तो एक ओर भ्रमरों को अपने नेत्रों की सुन्दरता से कमल का संभ्रम उत्पन्न कर रही हो तथा दूसरी ओर अपनी सुन्दर मराल गति द्वारा सखियों से रात्रि के रति विलास के गोपन की चेष्टा करती हुई प्रिय संगम के रहस्य का संशय उत्पन्न कर रही हो मानो कि तुमने प्रियतम से समागम ही प्राप्त नहीं किया हो। [4]

