मेरी प्रिय है लाडिली - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (277)

मेरी प्रिय है लाडिली - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (277)

मेरी प्रिय है लाडिली, छिन छिन प्रीति नवीन।
मेरे सुख में अति सुखी, हों उनके सुख लीन॥

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (277)

मेरी प्राणप्यारी तो श्री लाडिली जू ही हैं। वे क्षण-क्षण नई-नई प्रीति करती हुई मेरे सुख में ही अति सुखी होती हैं, और मैं भी उनके ही सुख में नित्य लीन रहती हूँ।