श्री ललितकिशोरीदास जी का जीवन परिचय - वृन्दावन के विरक्त रसिक संत

श्री ललितकिशोरीदास जी का जीवन परिचय - वृन्दावन के विरक्त रसिक संत

जन्म एवं बाल्यकाल
श्री स्वामी ललितकिशोरीदास जी का जन्म सं. १७३३ में भदावर राज्य के किसी गाँव में एक ब्राह्मण कुल में हुआ। माता पिता ने इनका नाम गंगाधर रखा।

आध्यात्मिक जीवन:
युवावस्था में ही उन्हें (श्री स्वामी ललितकिशोरीदास जी) को वैराग्य हो गया। तीर्थ भ्रमण करते करते वे वृन्दावन आये और श्री रसिकदास जी के शिष्य हो गए। तब उनका नाम ‘ललितकिशोरीदास’ हुआ।
वृन्दावन में वे कुछ दिन श्री रसिकदास जी के साथ उनकी सेवा में रहे। करुवा, कौपीन और कंथे के अतिरिक्त वह और कुछ भी अपने पास नहीं रखते थे। मधुकरी में जो मिल जाता था उसी से उदरपूर्ति कर लेते थे । वे दिन रात नित्य विहार रस में लीन रहते थे। उन्होंने अपनी त्यागमयी वृत्ति के कारण श्री रसिक बिहारी जी की गद्दी का महंत बनना भी स्वीकार नहीं किया। यमुना तट पर तरु-लताओं से परिवेष्ठित जिस सुरम्य स्थान पर वे रहते थे, उसे असुरक्षित जान भक्तो ने बांस की टटियों से घेर दिया। तभी से वह 'टटिया स्थान' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। कालांतर में उसने हरिदासी सम्प्रदाय के विरक्त महात्माओं को एक और गद्दी का रूप ले लिया। श्री ललित किशोरी देव जी वृंदावन आने के पश्चात जीवन पर्यन्त वृंदावन ही रहे, एवं इनकी समाधि भी टटिया स्थान में है। इनके पदों को देखकर इनका श्री राधारानी के प्रति विशेष लगाव एवं शरणागति रसोपासना के भक्तों को बहुत ही प्रभावित करता है । इसी कारण कुछ भक्त इन्हें स्वामी श्री हरिदास जी का भी अवतार मानते हैं ।

रचित ग्रन्थ:
श्री ललित किशोरी देव जी के पदों एवं दोहों को श्री ललित किशोरी देव जी की वाणी नामक ग्रंथ में संकलन किया गया है, उनमें से कुछ का वर्णन यहाँ किया गया है। अधिक आप इस लिंक में पढ़ सकते हैं।

1. परसाद विहारिनि रानी कौ।
अति आनंद बढै छिन ही छिन महा प्रेम सुखदानी कौ॥
जाकी सोभा कहत न आवै अद्भुत रूप निमानी कौ।
श्रीललितकिसोरी लाडलडावति अति जाननि मन जानी कौ॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी (63)
नित्य विहारीणी श्री राधे जू का नित्य विहार रूपी दिव्य प्रसाद छिन छिन आनंद पूर्वक है, एवं महाप्रेम सुख का दान करने वाला है। इस प्रसाद की शोभा अद्भुत एवं अनिर्वचनिय है। श्री ललित किशोरी जी कहते हैं कि मेरे मन को जानने वाली श्री किशोरी जी के कृपा प्रसाद के बल से ही वह लाड़ली लाल को मनमानी लाड़ लड़ाते हैं।

2. अनेक जन्म की भूल कों, छिन में देइ मिटाइ।
कुंजबिहारिनि लाडिली, जिनके सदा सहाइ॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी (270)
परम प्रवीण रसिक-शिरोमणि श्रीकुंजबिहारिनि लाड़िलीजू जिसको अपना निज बना लेती हैं, उसकी समस्त प्रकार से रक्षा करती हैं और उसका हाथ फिर किसी भी प्रकार से नहीं छोड़तीं हैं और उसके अनंत जन्मों की भूल को एक क्षण में मिटा देती हैं।

शिष्य परम्परा:
उनके (श्री स्वामी ललितकिशोरीदास जी) बहुत से शिष्य हुए, जिनमे 'श्री ललितमोहिनी जी' प्रधान थे।श्री ललितमोहिनी जी ने टटिया स्थान की विशेष उन्नति की ।