राधे जु के प्रान गोवर्धन धारी - श्री सूरदास जी, सूर सागर

राधे जु के प्रान गोवर्धन धारी - श्री सूरदास जी, सूर सागर

(राग बिहाग )
राधे जु के प्रान गोवर्धन धारी ॥
तरु तमाल डिंग कनक लता सी,
उर लिपटाति राधिका प्यारी ॥1॥
मरकत मणि नन्दलाल लाडिलो,
कंचन भूषन भानु दुलारी ।
'सूरदास' प्रभु प्रीति निरंतर,
जोरी जुगल बने बनवारी ॥2॥

- श्री सूरदास जी, सूर सागर

भावार्थ:
श्री कृष्ण जो श्री गिरिराज पर्वत को धारण करने वाले हैं वो श्री राधा जी के प्राण हैं। वे गहरे तमाल के वृक्ष हैं और उनकी प्रिय श्री राधिका उनके हृदय से चिपकी हुई सुनहरी बेल हैं। [1]
नंदनंदन श्री कृष्ण मरकत मणि (पन्ना) स्वरूप हैं तथा श्री वृषभानु नन्दिनी श्री राधा जी कंचन आभूषण स्वरूपा हैं। पन्ना रुपी श्री कृष्ण, किशोरी जी के आभूषणों में सदा विराजित रहते हैं। सूरदास जी कहते हैं, "मेरे प्रभु (श्री कृष्ण) और उनका प्रेम (श्री राधा) सदैव निरंतर वनों में (व्रज के) खेलते हैं। [2]"