राधापदाम्बुजरस-महामाधुरीमत्त-चेतो - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (9.04)

राधापदाम्बुजरस-महामाधुरीमत्त-चेतो - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (9.04)

राधापदाम्बुजरस-महामाधुरीमत्त-चेतो भृंगो निर्भंगुरपरिमिल्लोक-वेद प्रसंगः।
कंचिद्भावमधुरमधुरं भावयन् विश्वचेतो दृष्ट्याकृष्ट्याकृतिरपि भावयत्र वृन्दावने किम्॥

- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (9.04)

श्रीराधा जी के चरण-कमलों के रस के महामाधुर्य में भ्रमण को उन्मत करके, लोक-प्रसंग तथा वेद-प्रसंग को भी निरतिशय तोड़ कर, किसी मधुरातिमधुर भाव की निरन्तर चित्त में चिन्ता करते-करते एवं विश्व के चित्त एवं नैनों को आकर्षण करने वाली आकृति-विशिष्ट धारण कर क्या मैं श्रीवृन्दावन मे रह सकूंगा।