(राग रामकली - एकताल एवं राग विहाग)
बसौ मेरे नैननि में दोउ चंद। [1]
गोर बदनि बृषभानु नंदिनी, स्यामबरन नँदनंद॥ [2]
गोलक रहे लुभाय रूप में निरखत आनंदकंद। [3]
जय श्रीभट्ट प्रेमरस बंधन, क्यों छूटै दृढ़ फंद॥ [4]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (53)
श्रीभट्ट देवाचार्य कह रहे हैं "मेरी आँखों में वृन्दावन के दोनों चंद्र श्री राधा कृष्ण ही बसे हैं, गौर वर्ण की श्री वृषभानु नंदिनी हैं और श्याम वर्ण के नन्द नंदन।" [1 & 2]
आँखों के गोलक तो श्री जुगल जोरी के रूप माधुरी में ही लुभाए हुए हैं। [3]
श्रीभट्ट देवाचार्य कह रहे हैं "मैं तो श्री श्यामा श्याम के प्रेम रस के बंधन में बंध गया हूँ, जो इतना दृढ है के अब कैसे छूटे।" [4]
बसौ मेरे नैननि में दोउ चंद। [1]
गोर बदनि बृषभानु नंदिनी, स्यामबरन नँदनंद॥ [2]
गोलक रहे लुभाय रूप में निरखत आनंदकंद। [3]
जय श्रीभट्ट प्रेमरस बंधन, क्यों छूटै दृढ़ फंद॥ [4]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (53)
श्रीभट्ट देवाचार्य कह रहे हैं "मेरी आँखों में वृन्दावन के दोनों चंद्र श्री राधा कृष्ण ही बसे हैं, गौर वर्ण की श्री वृषभानु नंदिनी हैं और श्याम वर्ण के नन्द नंदन।" [1 & 2]
आँखों के गोलक तो श्री जुगल जोरी के रूप माधुरी में ही लुभाए हुए हैं। [3]
श्रीभट्ट देवाचार्य कह रहे हैं "मैं तो श्री श्यामा श्याम के प्रेम रस के बंधन में बंध गया हूँ, जो इतना दृढ है के अब कैसे छूटे।" [4]

