प्रेमपूरि पूरित प्रतेक नेत्र भंगिनीम - श्री मोहनचंद जी, श्री राधिकाष्टकम (4)

प्रेमपूरि पूरित प्रतेक नेत्र भंगिनीम - श्री मोहनचंद जी, श्री राधिकाष्टकम (4)

प्रेमपूरि पूरित प्रतेक नेत्र भंगिनीम। प्रेममत्तचित्त नन्द सूनु संग रंगिनीम॥
आलि मंडली विदग्धता समूह शासिनीं। राधिका महं भजे निकुञ्ज धाम वासिनीम्॥

- श्री मोहनचंद जी, श्री राधिकाष्टकम (4)

आपकी प्रत्येक आँखें प्रेम रूप की पूर्णता से चंचल हैं। आपका ह्रदय सदैव नंदनंदन श्री कृष्ण संग के प्रेम के रंग से रंगा हुआ है। आप अति प्रवीणता से अपने समस्त सखी समूह पर शासन करतीं हैं। हे निकुञ्ज धाम वासिनी श्री राधिका जू, मैं आपको नमन करता हूँ।