वरष हजारन तप किये, वेद चतुर्मुख गाये।
वृज वनीता की चरण रज, ब्रह्मा हूँ नहि पाये॥
- ब्रज के दोहे
ब्रह्मा जी ने हजारों वर्षों तक तप किया और अपने चारों मुखों से वेदों का गायन किया, फिर भी वे श्री राधारानी की चरण-रज को प्राप्त न कर सके।
वृज वनीता की चरण रज, ब्रह्मा हूँ नहि पाये॥
- ब्रज के दोहे
ब्रह्मा जी ने हजारों वर्षों तक तप किया और अपने चारों मुखों से वेदों का गायन किया, फिर भी वे श्री राधारानी की चरण-रज को प्राप्त न कर सके।

