परम सच्चिदानंद घन, वृन्दाविपिन सुदेस।
जामें कबहूँ होत नहिं, माया काल प्रवेस॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (97)
यह सुन्दरता की सीमा श्री वृन्दावन परम सच्चिदानन्दघन स्वरूप है, जिसमें कभी माया और काल का प्रवेश नहीं होता।
जामें कबहूँ होत नहिं, माया काल प्रवेस॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (97)
यह सुन्दरता की सीमा श्री वृन्दावन परम सच्चिदानन्दघन स्वरूप है, जिसमें कभी माया और काल का प्रवेश नहीं होता।

