चलो मन ! गहवर कुंज लतान।
जहँ विहरति वृषभानुनंदिनी, अरु नँदनंदन कान्ह॥ [1]
नित नव लीला करत गौर – हरि, सँग लै ब्रज बनितान।
सिंहासन आसीन ललिहिं पग, चापत श्याम सुजान॥ [2]
फिरत रहत गहवर गलियन महँ, करत लली गुन गान।
मुकुट उतारि ‘कृपालु’ धरत पग, लखि मानिनि को मान॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धान्त – माधुरी (41)
भावार्थ – अरे मन ! गहवर वन की लता कुंजों में चल, जहाँ वृषभानुनन्दिनी राधिका एवं नन्दनन्दन श्यामसुन्दर नित्य विहार करते हैं | [1]
वे दोनों सहस्त्रों ब्रजांगनाओं को साथ लेकर वहाँ नित्य नवीन लीलाएँ करते हैं | सिंहासन पर बैठीं हुई किशोरी जी के चरणों को श्यामसुन्दर स्वयं दबाते हैं। [2]
श्री कृष्ण गहवर वन की गलियों में किशोरी जी के गुणों को गाते हुए घूमते रहते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि यहाँ श्यामसुन्दर स्वामिनी जी की मानावस्था को देखकर अपने मुकुट को उतार कर उनके चरणों पर रखते हैं | [3]
जहँ विहरति वृषभानुनंदिनी, अरु नँदनंदन कान्ह॥ [1]
नित नव लीला करत गौर – हरि, सँग लै ब्रज बनितान।
सिंहासन आसीन ललिहिं पग, चापत श्याम सुजान॥ [2]
फिरत रहत गहवर गलियन महँ, करत लली गुन गान।
मुकुट उतारि ‘कृपालु’ धरत पग, लखि मानिनि को मान॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धान्त – माधुरी (41)
भावार्थ – अरे मन ! गहवर वन की लता कुंजों में चल, जहाँ वृषभानुनन्दिनी राधिका एवं नन्दनन्दन श्यामसुन्दर नित्य विहार करते हैं | [1]
वे दोनों सहस्त्रों ब्रजांगनाओं को साथ लेकर वहाँ नित्य नवीन लीलाएँ करते हैं | सिंहासन पर बैठीं हुई किशोरी जी के चरणों को श्यामसुन्दर स्वयं दबाते हैं। [2]
श्री कृष्ण गहवर वन की गलियों में किशोरी जी के गुणों को गाते हुए घूमते रहते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि यहाँ श्यामसुन्दर स्वामिनी जी की मानावस्था को देखकर अपने मुकुट को उतार कर उनके चरणों पर रखते हैं | [3]

