नेहडगर में पग धरै - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (128)

नेहडगर में पग धरै - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (128)

नेहडगर में पग धरै, फेर विचारै लाज।
नारायण नेही नहीं, बातन को महराज॥

- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (128)

श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि जो प्रेम की डगर पर कदम रखने के बाद भी लोक-लाज और कुल की मर्यादा का विचार करता है, वह वास्तव में सच्चा प्रेमी नहीं है। ऐसा व्यक्ति तो केवल बकवादी और शब्दों का महाराज है।