कौन चतुर जुवती प्रिया - श्री हरिवंश महाप्रभू, श्री हित चौरासी (6)

कौन चतुर जुवती प्रिया - श्री हरिवंश महाप्रभू, श्री हित चौरासी (6)

(राग विभास)
कौन चतुर जुवती प्रिया, जाहि मिलत लाल चोर ह्वै रैंन। [1]
दुरवत क्यौंऽब दूरै सुनि प्यारे, रंग में गहले चैन में नैंन। [2]
उर नख चंद विराने पट, अटपटे से बैंन। [3]
(जै श्री) हित हरिवंश रसिक राधापति प्रमथित मैंन॥ [4]

- श्री हरिवंश महाप्रभू, श्री हित चौरासी (6)

भावार्थ - "(श्रीहित अलि ने कहा-) हे लाल ! ऐसी कौन चतुर युवती प्रेयसी है (जिससे) आप रात्रि में चोरी चोरी मिलते हैं ? [1]
हे प्यारे ! आनन्द विलास रंजित एवं सुख पूरित आपके नयन भला कहीं छिपाने से छिप सकते हैं? [2]
वक्षस्थल पर ये नख चन्द्र के चिह्न पलटे हुए पराये वस्त्र और तिस पर यह अटपटे से बोल ? [3]
बहुत स्पष्ट है कि रसिक राधापति ! आप मदन के द्वारा विशेष प्रमथित कर दिये गये हैं।" [4]