(राग सारंग)
राधावल्लभ मेरौ प्यारौ।
सर्वोपरि सबहीकौ ठाकुर, सब सुखदानि हमारौ॥ [1]
व्रज वृंदावन नाइक सेवा लाइक स्याम उज्यारौ।
प्रीति रीति पहिचानैं जानैं रसिकनि कौ रखवारौ॥ [2]
स्याम कमल दल-लोचन, मोचन दुख नैंननि कौ तारौ।
अवतारी सब अवतारनि कौ महतारी महतारौ॥ [3]
मूरतिवंत-काम गोपिन कौ गो गोपनि कौ गारौ।
व्यासदास कौ प्रान जीवन धन, छिन न हृदैं तैं टारौ॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (61)
श्री हरिराम व्यास कह रहे हैं "जो सर्वोपरि हैं, समस्त जनों के ठाकुर अथवा इष्ट हैं, सब को सुख दान करने वाले हैं, वे श्री राधावल्लभ मेरे प्राणधन हैं।" [1]
श्री राधावल्लभ व्रज वृन्दावन धाम के नायक हैं, प्रेम की रीति को जानने वाले हैं, रसिकों के रखवाले तथा पालक हैं, इसलिए उचित है की ऐसे एकमात्र उनकी ही सेवा में जीवन व्यतीत हो। [2]
समस्त अवतार श्री राधावल्लभ से ही प्रकट होते हैं, अनंत कोटी ब्रह्मांडों के माता पिता भी यही हैं, जिनके नेत्र श्याम वर्ण के कमल की पंखुड़ीयों के समान है, जो दुख को मिटाने वाले हैं, मेरी आँखों के तारे हैं। [3]
श्री हरिराम व्यास जी कह रहे हैं "श्री राधावल्लभ ब्रज की गोपियों के लिए मूर्तिमान प्रेम हैं तथा गायों एवं गोपों के गर्व हैं, ऐसे श्री राधावल्लभ मेरे प्राण जीवन धन हैं, जिन्हे मैं एक क्षण के लिए भी हृदय से विलग नहीं करता।" [4]
राधावल्लभ मेरौ प्यारौ।
सर्वोपरि सबहीकौ ठाकुर, सब सुखदानि हमारौ॥ [1]
व्रज वृंदावन नाइक सेवा लाइक स्याम उज्यारौ।
प्रीति रीति पहिचानैं जानैं रसिकनि कौ रखवारौ॥ [2]
स्याम कमल दल-लोचन, मोचन दुख नैंननि कौ तारौ।
अवतारी सब अवतारनि कौ महतारी महतारौ॥ [3]
मूरतिवंत-काम गोपिन कौ गो गोपनि कौ गारौ।
व्यासदास कौ प्रान जीवन धन, छिन न हृदैं तैं टारौ॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (61)
श्री हरिराम व्यास कह रहे हैं "जो सर्वोपरि हैं, समस्त जनों के ठाकुर अथवा इष्ट हैं, सब को सुख दान करने वाले हैं, वे श्री राधावल्लभ मेरे प्राणधन हैं।" [1]
श्री राधावल्लभ व्रज वृन्दावन धाम के नायक हैं, प्रेम की रीति को जानने वाले हैं, रसिकों के रखवाले तथा पालक हैं, इसलिए उचित है की ऐसे एकमात्र उनकी ही सेवा में जीवन व्यतीत हो। [2]
समस्त अवतार श्री राधावल्लभ से ही प्रकट होते हैं, अनंत कोटी ब्रह्मांडों के माता पिता भी यही हैं, जिनके नेत्र श्याम वर्ण के कमल की पंखुड़ीयों के समान है, जो दुख को मिटाने वाले हैं, मेरी आँखों के तारे हैं। [3]
श्री हरिराम व्यास जी कह रहे हैं "श्री राधावल्लभ ब्रज की गोपियों के लिए मूर्तिमान प्रेम हैं तथा गायों एवं गोपों के गर्व हैं, ऐसे श्री राधावल्लभ मेरे प्राण जीवन धन हैं, जिन्हे मैं एक क्षण के लिए भी हृदय से विलग नहीं करता।" [4]

