हम तो वृन्दावन रस अटके - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी) की वाणी, छूटक पद (118)

हम तो वृन्दावन रस अटके - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी) की वाणी, छूटक पद (118)

हम तो वृन्दावन रस अटके। [1]
जब लगि इहिं रस अटके नाहीं तब लगि बहुबिधि भटके॥ [2]
भये मगन सुखसिन्धु माँझ ह्याँ सब तजिकै जग खटके। [3]
अब विलास रस रासहि निरखत नागरि - नागर नटके॥ [4]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (118)

श्री नागरीदास कह रहे हैं "मैं तो श्री वृन्दावन रस में डूब चुका हूँ। [1]

जब तक इस रस का परिचय नहीं हुआ तब तक संसार में बहुत भटकता रहा। [2]

इस नीरस जगत को त्याग कर मैं वृन्दावन के मधुर रस समुद्र में आ गिरा और अब तो श्यामा श्याम के रास विलास को देखने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है।" [3 & 4]