भाँति रँगीली छबीली के संग - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (4)

भाँति रँगीली छबीली के संग - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (4)

भाँति रँगीली छबीली के संग, छबीलौ बन्यौ छबि की निधि माई। [1]
सेज सहानी सुरंग बनी, तिहि ऊपर केलि करैं सुखदाई॥ [2]
हिय सौं हिय लाइ रहे लपटाइ, लसै अँग अंग में अंगनि - झाँई। [3]
मिलीं 'ध्रुव' द्वै सरिता छबि की, मनौं दीठि तहाँ न कहूँ ठहराई॥ [4]

- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (4)

भावार्थ : हे सखि ! अनुराग - रंजीता छबि आगरी प्रिया का सङ्ग प्राप्त कर आज छबीले लाल छबि - रत्नाकर बन गये हैं । [1]
अति सुन्दर सहाने तल्प पर वे तत्सुख रति - केलि परायण हैं । [2]
हृदय से हृदय मिलाये हुए दृढ़ बाहु - पाश में आबद्ध वे एक दूसरे के अङ्ग - प्रत्यङ्ग में प्रतिबिम्बित हो रहे हैं । [3]
श्री धुवदास जी कहते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है जैसे छवि एवं सौन्दर्य की दो सरिताएँ परस्पर में मिल गयी हों . जहाँ दृष्टि स्थिर नहीं हो पाती है। [4]