तुव कृपा ते लाडिली तेरो सुख लहियै। [1]
तू मेरी जीवनि प्रान है कासौं यह कहियै॥ [2]
यह मनोरथ लाडिली अंग संग नित रहियै। [3]
ढील न कीजे लाडिली हसि कंठ लगैयै॥ [4]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (32)
ललित किशोरी देव श्री स्वामिनी जू से कह रहे हैं “हे मेरी प्राणजीवन श्री लाड़िली जू ! आपकी कृपा से ही आपका महासुख मुझे प्राप्त हो सका है। [1]
आप ही एकमात्र मेरे जीवन की प्राण हैं, इस बात को मैं और किससे कहूँ। [2]
मेरा केवल एक ही मनोरथ है कि आपके ही अंग-संग में नित्य विचरण करूँ।” [3]
जब इतना कहने पर भी स्वामिनी जू ने कोई उत्तर नहीं दिया, तब श्री ललित किशोरी देव अति आतुर हो कहने लगे कि "हे प्राण-लाड़िली जू ! आप और देर ना कीजिये, मुझको हँसते हुए अपने कंठ से लगा लीजिये।" [4]
तू मेरी जीवनि प्रान है कासौं यह कहियै॥ [2]
यह मनोरथ लाडिली अंग संग नित रहियै। [3]
ढील न कीजे लाडिली हसि कंठ लगैयै॥ [4]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (32)
ललित किशोरी देव श्री स्वामिनी जू से कह रहे हैं “हे मेरी प्राणजीवन श्री लाड़िली जू ! आपकी कृपा से ही आपका महासुख मुझे प्राप्त हो सका है। [1]
आप ही एकमात्र मेरे जीवन की प्राण हैं, इस बात को मैं और किससे कहूँ। [2]
मेरा केवल एक ही मनोरथ है कि आपके ही अंग-संग में नित्य विचरण करूँ।” [3]
जब इतना कहने पर भी स्वामिनी जू ने कोई उत्तर नहीं दिया, तब श्री ललित किशोरी देव अति आतुर हो कहने लगे कि "हे प्राण-लाड़िली जू ! आप और देर ना कीजिये, मुझको हँसते हुए अपने कंठ से लगा लीजिये।" [4]

