रसिकन की, गति रसिकन जाने। [1]
ज्यों कामिनि आलिंगन सुख कहँ, शिशु नहिं सपनेहुँ पहिचाने॥ [2]
गोपिन काम श्यामसुन्दर सों, सो निष्काम रसिक माने। [3]
दुर्वासा दूबहिं खाये पै, खाय गये सिगरे खाने॥ [4]
आत्माराम कहाय श्याम पै, नित्य रास गोपिन ठाने। [5]
कह ‘कृपालु’ यह दिव्य विषय किमि, जाने विषयन - रस - साने॥ [6]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, रसिया - माधुरी (15)
एक रसिक कहता है कि रसिकों की अटपटी बातें रसिक ही समझ सकते हैं । [1]
जिस प्रकार पाँच वर्ष के भोले बालक को कामयुक्त युवती के आलिंगन का सुख स्वप्न में भी नहीं प्रतीत होता । उसी प्रकार अरसिक भी रसिकों की बातों से अपरिचित रहता है । [2]
आश्चर्य देखो ! गोपियों का एकमात्र काम ( प्रेम ) श्यामसुन्दर से ही है, फिर भी उन्हें रसिक लोग परम निष्काम मानते हैं । [3]
दुर्वासा मुनि ने ब्रजांगनाओं द्वारा बहुमात्रा में बहु – व्यंजनों को खाकर भी दूब ही खायी, ऐसा रसिकों ने स्वीकार किया है । [4]
श्यामसुन्दर को वेद – शास्त्र ‘आत्माराम’ कहते हैं, जबकि वे गोपियों के साथ नित्य रास – रमण करते हैं । [5]
‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि सब दिव्य विषय की बातें हैं, जिन्हें प्राकृत विषयासक्त जीव किसी भी प्रकार नहीं समझ सकता । [6]
ज्यों कामिनि आलिंगन सुख कहँ, शिशु नहिं सपनेहुँ पहिचाने॥ [2]
गोपिन काम श्यामसुन्दर सों, सो निष्काम रसिक माने। [3]
दुर्वासा दूबहिं खाये पै, खाय गये सिगरे खाने॥ [4]
आत्माराम कहाय श्याम पै, नित्य रास गोपिन ठाने। [5]
कह ‘कृपालु’ यह दिव्य विषय किमि, जाने विषयन - रस - साने॥ [6]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, रसिया - माधुरी (15)
एक रसिक कहता है कि रसिकों की अटपटी बातें रसिक ही समझ सकते हैं । [1]
जिस प्रकार पाँच वर्ष के भोले बालक को कामयुक्त युवती के आलिंगन का सुख स्वप्न में भी नहीं प्रतीत होता । उसी प्रकार अरसिक भी रसिकों की बातों से अपरिचित रहता है । [2]
आश्चर्य देखो ! गोपियों का एकमात्र काम ( प्रेम ) श्यामसुन्दर से ही है, फिर भी उन्हें रसिक लोग परम निष्काम मानते हैं । [3]
दुर्वासा मुनि ने ब्रजांगनाओं द्वारा बहुमात्रा में बहु – व्यंजनों को खाकर भी दूब ही खायी, ऐसा रसिकों ने स्वीकार किया है । [4]
श्यामसुन्दर को वेद – शास्त्र ‘आत्माराम’ कहते हैं, जबकि वे गोपियों के साथ नित्य रास – रमण करते हैं । [5]
‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि सब दिव्य विषय की बातें हैं, जिन्हें प्राकृत विषयासक्त जीव किसी भी प्रकार नहीं समझ सकता । [6]

