इतनी कहौ कृपालु किशोरी॥
कबहूँ तौ तुम मोहि देखिहौ, सहज कृपा की कोरी।
कबहूँ तौ व्याकुल भटकैहौ, ढूँढ़त निधुवन खोरी॥ [1]
कबहूँ तौ भुज गहि मुसकैहौ, सहज पौंछ दृग मोरी।
कबहूँ तौ दृग दरस दिखैहौ, मन्द हँसन मुख थोरी॥ [2]
इतनौ हँसि अवलंब दीजिये, ज्यौं थिर होय हियौ री।
'भोरी' नैंक मिलन आसा पर, काटौं जन्म करोरी॥ [3]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (280)
हे परम कृपालु नित्य नव किशोरी श्री राधे! आप मुझे इन बातों का आश्वासन तो प्रदान करो कि कभी न कभी आप मुझे अपनी कृपा भरी नजरों से अवश्य निहारोगी, कभी न कभी आपके दर्शनों के लिये अत्यन्त व्याकुलता से भरी होकर, मैं आपको ढूँढ़ती हुई, निधिवन के भीतर अवश्य भटकती फिरूँगी। [1]
कभी न कभी आप मेरे आँसुओं को पोंछते हुए, मेरी भुजाओं को पकड़कर, अपनी सहज मुसकान से मुझे कृतार्थ अवश्य करोगी, कभी न कभी अपने मुख पर मन्द-मधुर मुस्कान के साथ, आप मुझे अपनी एक झलक, एक क्षण के लिये ही सही, अवश्य दिखाओगी। [2]
हे प्यारी जू ! आप हँसते हुए, मेरी इन प्रार्थनाओं को पूरी करने का कम से कम आश्वासन तो दें, जिससे कि मेरे विकल हृदय को कुछ सान्त्वना मिल सके, कुछ ढाँढ़स ही बँध सकैं। श्री हित भोरीसखी जी कहती हैं कि आपसे मिलने की आशा में, मैं अपने करोड़ों जन्मों को व्यतीत कर सकती हूँ। [3]
कबहूँ तौ तुम मोहि देखिहौ, सहज कृपा की कोरी।
कबहूँ तौ व्याकुल भटकैहौ, ढूँढ़त निधुवन खोरी॥ [1]
कबहूँ तौ भुज गहि मुसकैहौ, सहज पौंछ दृग मोरी।
कबहूँ तौ दृग दरस दिखैहौ, मन्द हँसन मुख थोरी॥ [2]
इतनौ हँसि अवलंब दीजिये, ज्यौं थिर होय हियौ री।
'भोरी' नैंक मिलन आसा पर, काटौं जन्म करोरी॥ [3]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (280)
हे परम कृपालु नित्य नव किशोरी श्री राधे! आप मुझे इन बातों का आश्वासन तो प्रदान करो कि कभी न कभी आप मुझे अपनी कृपा भरी नजरों से अवश्य निहारोगी, कभी न कभी आपके दर्शनों के लिये अत्यन्त व्याकुलता से भरी होकर, मैं आपको ढूँढ़ती हुई, निधिवन के भीतर अवश्य भटकती फिरूँगी। [1]
कभी न कभी आप मेरे आँसुओं को पोंछते हुए, मेरी भुजाओं को पकड़कर, अपनी सहज मुसकान से मुझे कृतार्थ अवश्य करोगी, कभी न कभी अपने मुख पर मन्द-मधुर मुस्कान के साथ, आप मुझे अपनी एक झलक, एक क्षण के लिये ही सही, अवश्य दिखाओगी। [2]
हे प्यारी जू ! आप हँसते हुए, मेरी इन प्रार्थनाओं को पूरी करने का कम से कम आश्वासन तो दें, जिससे कि मेरे विकल हृदय को कुछ सान्त्वना मिल सके, कुछ ढाँढ़स ही बँध सकैं। श्री हित भोरीसखी जी कहती हैं कि आपसे मिलने की आशा में, मैं अपने करोड़ों जन्मों को व्यतीत कर सकती हूँ। [3]

